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    Home » History of Sengol: जानें सेंगोल क्या हैं? जिसे नये संसद भवन में स्थापित किया गया हैं,सेंगोल का पूरा इतिहास

    History of Sengol: जानें सेंगोल क्या हैं? जिसे नये संसद भवन में स्थापित किया गया हैं,सेंगोल का पूरा इतिहास

    WashimBy Washim10/11/2023Updated:14/03/20243 Comments7 Mins Read
    Sengol
    Sengol

    History of Sengol: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (28 मई 2023) लोकतंत्र के नए मंदिर (नये संसद भवन) में विधि-विधान के साथ सेंगोल को स्थापित किया| सेंगोल को भारत की आजादी का प्रतीक माना जाता हैं | इसका इतिहास भारत की आजादी से जुड़ा हुआ है|

    • सेंगोल शब्द का अर्थ
    • Sengol की बनावट
    • सेंगोल पर नंदी होने का अर्थ
    • सेंगोल क्या हैं ?
    • सेंगोल का इतिहास (History Of Sengol)
    • सेंगोल का आधुनिक इतिहास आजादी से जुड़ा हैं
    • FAQ

    सेंगोल एक स्वर्ण परत वाला राजदण्ड है जिसे 28 मई 2023 को भारत के नए संसद भवन में स्थापित किया गया है।इसका इतिहास चोल साम्राज्य से जुड़ा है। सेंगोल जिस शासक को सौंपा जाता है, उससे उम्मीद की जाती हैं कि वह निष्पक्ष व न्यायपूर्ण शासन देगा।

    ऐसा माना जाता है कि भारत की आजादी का हस्तांतरण सेंगोल द्वारा हुआ था| 14 अगस्त 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्ति की घोषणा के पश्चात तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को आधी रात को सेंगोल सौंप दिया था। कुछ समय बाद में सेंगोल को इलाहाबाद संग्रहालय में रख दिया गया था। सेंगोल सोने और चांदी से बना हुआ है।

    शनिवार (27 मई 2023) को शरीर पर केसरिया वस्त्र, माथे पर त्रिपुंड चंदन और गले में शैव परंपरा से जुड़ी मालाएं पहने तमिलनाडु के आधीनम महंतो ने पीएम मोदी को सेंगोल सौंपा| इसे बाद में रविवार को सुबह विधि-विधान के साथ नये संसद भवन में स्थापित किया गया | इसे लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के आसन के पास स्थापित किया गया हैं|


    सेंगोल शब्द का अर्थ

    सेंगोल तमिल शब्द ‘सेम्मई’ (नीतिपरायणता) व ‘कोल’ (छड़ी) से मिलकर बना हुआ है। ‘सेंगोल’ शब्द संस्कृत के ‘संकु’ (शंख) से भी लिया हो सकता है। सनातन धर्म में शंख को बहुत ही पवित्र माना जाता है। मंदिरों और घरों में आरती के समय शंख का प्रयोग आज भी किया जाता है।

    तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित तमिल विश्वविद्यालय में पुरातत्त्व के प्रोफेसर एस राजावेलु के अनुसार तमिल में सेंगोल का अर्थ ‘न्याय’ है। तमिल राजाओं के पास ये सेंगोल होते थे जिसे अच्छे शासन का प्रतीक माना जाता था। शिलप्पदिकारम् और मणिमेखलै, दो महाकाव्य हैं जिनमें सेंगोल के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। विश्वप्रसिद्ध तिरुक्कुरल में भी सेंगोल का उल्लेख है।

    Sengol की बनावट

    सेंगोल सोने की परत चढ़ा हुआ राजदंड है, जिसकी लंबाई लगभग 5 फीट (1.5 मीटर) है| इसका मुख्य हिस्सा चांदी से बना है। सेंगोल को बनाने में 800 ग्राम (1.8 पौंड) सोना लगाया गया था। इस पर शानदार नक्कासी ( जटिल डिजाइन) की गई हैं | शीर्ष पर नंदी की प्रतिमा उकेरी गई है। नंदी को हिंदू धर्म में एक पवित्र पशु माना गया हैं और नंदी भगवान शिव का वाहन है। नंदी को पुराणों में शक्ति-सम्पन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना गया हैं| नंदी की प्रतिमा के कारण सेंगोल का शैव परंपरा से जुड़ाव प्रदर्शित होता है।


    सेंगोल पर नंदी होने का अर्थ

    हिंदू व शैव परंपरा में नंदी को शक्ति-सम्पन्नता व समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह समर्पण राजा और प्रजा दोनों का राज्य के प्रति लगाव को दर्शाता है। शिव मंदिरों में नंदी हमेशा शिव के सामने स्थिर मुद्रा में बैठे हुए होते हैं। हिंदू मिथकों के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पति शिवलिंग से हुई मानी जाती है। इस प्रकार नंदी की स्थिरता को शासन के प्रति अडिग होने का प्रतीक माना गया है। इसके अतिरिक्त नंदी के नीचे वाले भाग में देवी लक्ष्मी व उनके आस-पास हरियाली के तौर पर फूल-पत्तियां, बेल-बूटे के चित्र उकेरे गए हैं, जो कि राज्य की संपन्नता व कृषि संपदा के प्रतीक हैं|

    सेंगोल क्या हैं ?

    Sengol को सामान्य भाषा में राजदंड कहा जा सकता है। ये छड़ी जैसा दिखता है जो नीचे से पतला और ऊपर की ओर मोटा होता है। इस पर सुंदर नक्काशी होती है और सबसे ऊपर की ओर नंदी की प्रतिमा होती है। इसकी लंबाई लगभग 5 फीट होती है। इस पर तिरंगा भी बना होता है। संगोंल को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक भी माना जाता है। जब अंग्रेज भारत से गए तो उन्होंने अपनी सत्ता सौंपने के प्रतीक के रूप में जवाहरलाल नेहरू को सेंगोल सौंपा था।

    सेंगोल का इतिहास (History Of Sengol)

    History Of Sengol – सेंगोल के इतिहास को लगभग 5000 साल पुराना माना जाता हैं | इसका जिक्र महाभारत और रामायण जैसे ग्रन्थों में मिलता हैं | पुराने समय में जब राजा का राजतिलक होता था और राजमुकुट पहनाया जाता था | राजतिलक होने के बाद राजा को धातु की एक छड़ी भी थमाई जाती थी, जिसको राजदंड कहा जाता था|

    राज्याभिषेक होने के बाद राजा जब गद्दी पर बैठता था तो वह तीन बार ‘अदण्ड्यो: अस्मि’ कहता है| ‘अदण्ड्यो: अस्मि’ का तात्पर्य हैं कि मुझे कोई दंडित नही कर सकता हैं | पुरानी विधि के अनुसार राजा के पास लँगोटी पहने हुए एक संन्यासी (पुरोहित)खड़ा रहता था। उसके हाथ में एक छोटा, पतला सा पलाश का डण्डा होता था। वह उससे राजा को तीन बार मारता हुआ कहता था कि ‘राजा ! यह ‘अदण्ड्योऽस्मि अदण्ड्योऽस्मि’ गलत है। ‘ धर्म दण्ड्योऽसि, धर्मदण्ड्योऽसि’ अर्थात तुझे भी धर्म द्वारा दण्डित किया जा सकता है| ऐसा कहते हुए पुरोहित राजा को राजदंड सौपता था| यानि राजदंड को राजा की मनमानी पर रोक लगाने का साधन भी माना जाता था|

    History of Sengol


    चोल काल के दौरान भी राजदंड का प्रयोग सत्ता हस्तान्तरण करने के लिए किया जाता था। उस समय पुराना राजा नए राजा को इसे सौंपता था।राजदंड सौंपने के दौरान 7वीं शताब्दी के तमिल संत संबंध स्वामी द्वारा रचित एक विशेष गीत का गायन भी किया जाता था। कुछ इतिहासकार मौर्य, गुप्त वंश और विजयनगर साम्राज्य में भी सेंगोल को प्रयोग किए जाने की बात कहते हैं।

    सेंगोल का आधुनिक इतिहास आजादी से जुड़ा हैं

    जब भारत को आजादी मिली तो भारत के आख़िरी वायसरॉय माउंटबेटेन ने पं. जवाहर लाल नेहरू से पूछा कि भारत की बागडोर ब्रिटिश से लेकर भारत को कैसे सौंपी जायें? नेहरू ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजा जी ) से सता हस्तांतरण के बारे में सलाह ली| तब राजगोपालाचारी ने कहा कि सदियों पहले दक्षिण भारत की चेरा, चोला और पंड्या वंशों में जिस तरह सत्ता का हस्तांतरण किया जाता था ठीक उसी तरह अंग्रेज़ों से भारत को सत्ता सौंपी जानी चाहिए| राजा जी ने बताया कि चोल साम्राज्य में इस परंपरा का पालन किया जाता था|

    राजा जी का सुझाव मानकर उन्हें ‘भारत की स्वाधीनता का प्रतीक चिह्न’ बनाने का कार्य दे दिया गया था| राजा जी थिरुवावादुथुरई (चेन्नई ) अधीनम मठ के मठाधीश के पास पहुंचे| मठाधीश ने वुम्मिदी बंगारू ज्वैलर्स को राजदंड बनाने की जिम्मेदारी दे दी|

    वुम्मिदी बंगारू चेट्टी ने ‘सैंगोल’ तैयार करके अधीनम के प्रतिनिधि को दे दिया। अधीनम के नेता ने वह सैंगोल पहले लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। फिर उनसे वापस लेकर 15 अगस्त 1947 के शुरू होने से ठीक 15 मिनट पहले स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दे दिया। इसे बाद में इलाहाबाद म्यूज़ियम में नेहरू द्वारा इस्तेमाल की गई अन्य वस्तुओं के साथ रखा गया |

    28 मई 2023 को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे नए संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष के आसन के ठीक निकट स्थापित कर दिया।

    FAQ

    Q.1. सेंगोल क्या हैं ?

    Ans – सेंगोल सत्ता हस्तातंरण का प्रतीक हैं |

    Q.2. सेंगोल को कब से सत्ता हस्तातंरण का प्रतीक माना जाता हैं ?

    Ans – सेंगोल को सदियों पहले से दक्षिण भारत की चेरा, चोला और पंड्या वंशों में सत्ता का हस्तांतरण का प्रतीक माना जाता हैं| Sengol की History जानने के लिए पोस्ट को पढ़े|

    Q.3. नई संसद में सेंगोल को कहाँ स्थापित किया गया हैं ?

    Ans – 28 मई 2023 को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे नए संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष के आसन के ठीक निकट स्थापित कर दिया।

    Q.4. सेंगोल पर नंदी को किसका प्रतीक माना जाता हैं ?

    Ans – नंदी को पुराणों में शक्ति-सम्पन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना गया हैं|

    Fact
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    Washim

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      3 Comments

      1. Chol snstapk on 22/09/2023 11:49 AM

        नंदी बैल सांड का अर्थ पता कर भाई

        Log in to Reply
      2. T.K.Goswami on 22/09/2023 12:06 PM

        Our country India is not rule by king. It is now a Democratic Secular Country. We have our Elected Govt.I don’t understand the significance of keeping Sengal in Parliament house. The Sengal will never be transffered to any next PM. So

        Log in to Reply
      3. Rajendra Kumar Joshi on 22/09/2023 12:27 PM

        संगोल के सबसे ऊपर नंदी नहीं बैल है. बैल धर्म का प्रतीक है. संगोल धर्म अथवा न्याय के शाशन का प्रतीक भी कहा जा सकता है, ऐसे शाशन से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं इसलिये लक्ष्मी जी का स्थान धर्म राज बैल से नीचे है.

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